हुमायूँ के मकबरे का इतिहास | Humayun Tomb History in Hindi
हुमायूँ के मकबरे को हुमायूँ के मौत के 15 साल बाद बनवाया गया था। हुमायूँ के मकबरे में हुमायूँ के अलावा उसके परिजनों के 160 कब्र भी इसमें बनाये गए। जिसमे लाल किला और क़ुतुब मीनार जहाँ अपनी तरफ लाखों सैलानियों को बटोरे जा रहे है। ठीक इसके दूसरी तरफ हुमायूँ का मकबरा इन सब से दूर दिल्ली के एक कोने में शांत बैठा हुआ है। यह मकबरा इतना पॉपुलर नहीं हो पाया जितना लाल किला और क़ुतुब मीनार। क्युकि हुमायूँ के मकबरे का इतिहास इतना खास नहीं था।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हुमायूँ का मकबरा लावारिस है। इसमें भी कई राज दफ़न है, और इसके बारे में कई सारे किस्से कहानियां प्रचलित है। जिनके बारे में जानना बहुत जरुरी है। क्युकि हुमायूँ का मकबरा अब फिर से लोगों के बीच अपनी पहचान बना रहा है। साथ ही मैं आपको हुमायूँ के मकबरे के इतिहास से जुड़ी कुछ ऐसे बातों को बताऊंगा। जिनके बारे में बहुत कम जानकारियां मौजूद है।
हुमायूँ के मकबरे के इतिहास से जुडी बातें
हुमायूँ के मकबरे को हुमायूँ के मौत के 15 साल बाद बनवाया गया था। हुमायूँ के मकबरे में हुमायूँ के अलावा उसके परिजनों के 160 कब्र भी इसमें बनाये गए। जिसमे बाबर और इसाक खान का कब्र भी शामिल है। और ये सभी कब्र मकबरे के सामने बने बगीचे में स्थित है। इन कब्रों को देख कर लगता है जैसे यह इंसाफ की मांग कर रहे है।
मकबरे के चारों ओर बना बगीचा पारसी सभ्यता से मिलता है। और साथ ही इसके गुम्बद के ऊपर एक आधा चन्द्रमा मिलता है। जो तैमूर वंश के मकबरों में भी पाया जाता है। भारत में इससे पहले इतना आलीशान मकबरा कभी नहीं बना था। मकबरे का यह डिज़ाइन इतना मशहूर हुआ कि बाद के लगभग सभी मकबरे इसी की तरह बनाए गए। आगरा का
ताज महल भी हुमायूँ के मकबरे को देख कर ही बनाया गया था।
इस मकबरे को बनाने के लिए मुख्यतः पत्थर और चुने का इस्तेमाल किया गया था। जिस पर लाल बलुआ पत्थर से ढाका गया था। यह पहला ऐसा मकबरा था जिस पर इतने बड़े पैमाने पर लाल बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया गया था। और सफ़ेद संगमरमर से इसके दीवारों को सजाया गया था। निर्माण के समय इसकी लागत 15 लाख रुपए थी।
आज भी इस मकबरे की मरम्मत करने के लिए इस लाल बलुआ पत्थर को राजस्थान के भरतपुर से लाया जाता है। मकबरे पर बनी नक्काशियां अब समय की परतों के नीचे दब सी गयी है। जिन्हे आज फिर से उभारा जा रहा है।
UNESCO ने इसे 1993 में विश्व धरोहर स्थल घोसित कर दिया था। जिसके कारण इसको अब इसको बचाने और संभाल कर रखने की कोशिश की जा रही है।
हुमायूँ का मकबरा किसने बनवाया ?
हुमायूँ की बेग़म हमीदा बानो के कहने पर पारसी आर्किटेक्ट मीरक मिर्ज़ा गियाथ द्वारा बनवाया गया था। हुमायूँ के मकबरे का निर्माण कार्य 1565 में शुरू किया गया था और 1572 में बना कर तैयार कर लिया गया था। इस तरह इसके निर्माण कार्य में कुल 8 सालों का समय लगा। इसके डिज़ाइन का श्रेय समकालीन इतिहासकार अब्द अल कादर बंदा यूनि को जाता है। वैसे मीरक मिर्ज़ा गियाथ की मृत्यु अधूरे निर्माण में ही हो गयी थी। जिसको बाद में मीरक मिर्ज़ा गियाथ के बेटे सैय्यद मुहम्मद इब्न मिराक गियाथ उद दीन ने पूरा किया।
शुरू में हुमायूँ का कब्र दीनपनाह (पुराना किला) में ही था। राजा हेम चंद्र विक्रम आदित्य (हेमू) ने पुराना किला को जीतने के बाद हुमायूँ की लाश जमीन से उखाड़ फेंका। लेकिन हुमायूँ के बचे सैनिकों ने हुमायूँ की लाश को वापस अपने कब्जे में लेकर राजा हेम चंद्र विक्रम आदित्य से बचाते फिरे। यह लाश कंधार, कलानौर, सरहिंदी जैसे कई जगहों पर 15 वर्षों तक भटकती रही।
बाद में अकबर के सत्ता में आने के बाद हुमायूँ की लाश को हासिल कर लिया। और हुमायूँ की विधवा बेगम के कहने पर हुमायूँ का मकबरा बनवा दिया। आगे चलके मुग़ल साम्राज्य के कुछ और शासकों को यही दफनाया गया। हुमायूँ के इस मकबरे को हज़रत निजामुद्दीन की दरगाह के समीप बनाया गया। यह परिसर ज्यामिति का सबसे जटिल उदहारण है।
हुमायूँ का इतिहास | हुमायूँ कौन था ?
हुमायूँ का पूरा नाम नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ था जो मुग़ल साम्राज्य का दूसरा शासक था। और ये मुग़ल साम्राज्य के पहले शासक बाबर का सबसे बड़ा बेटा था। हुमायूँ का जन्म 6 मार्च 1508 को काबुल में हुआ था। 30 दिसम्बर 1530 में अपनी मृत्यु से पहले बाबर ने हुमायूँ का राज्याभिषेक किया और सिंहासन पर बैठाया। कुछ इतिहासकार का मानना है कि हुमायूँ सबसे बदकिस्मत बादशाह था। हुमायूँ का मतलब तो खुशकिस्मत होता है लेकिन असल में वो सभी जगह ठोकर ही खाता रहा।
हुमायूँ ने अपने जीवन की पहली लड़ाई 1531 में कालिंजर पर की। लेकिन कालिंजर के राजा प्रताप रूद्र देव को हराने के बजाय उससे पैसे लेकर छोड़ दिया। और अफ़ग़ान के सरदार मुहम्मद लोदी से लड़ने बिहार की ओर चल पड़ा। 1532 में हुमायूँ ने मुहम्मद लोदी को उत्तर प्रदेश के दोहरिया नामक जगह पर युद्ध में हरा दिया।
चौसा की लड़ाई
1539 में चौसा की लड़ाई में हुमायूँ शेरशाह सूरी से युद्ध में हार गया और मैदान छोड़ कर भाग गया। इस तरह मुग़ल साम्राज्य 1539 से 1555 तक गायब हो गया। शेरशाह सूरी ने हुमायूँ को हराने के बाद भारत में सूरवंश की स्थापना की।सर हिन्द का युद्ध
शेरशाह सूरी का बनाया सूरवंश धीरे धीरे कमजोर पड़ता गया और हुमायूँ ने इसका फायदा उठाते हुए 22 जून 1555 में सर हिन्द के युद्ध में सूरवंश के छठे राजा सुल्तान सिकंदर सूर को हुमायूँ की तरफ से आए बैरम खान ने हरा दिया। और अगले दिन ही हुमायूँ फिर एक बार दिल्ली के सिंहासन पर बैठ गया। इस तरह भारत में मुग़ल साम्राज्य की वापसी हुई।
हुमायूँ की मौत कैसे हुई ?
27 जनवरी 1956 में दिल्ली के दिन पनाह (
पुराने क़िले) में स्थित शेर मंडल नाम के पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिर कर हुमायूँ की मृत्यु हो गई। दीन पनाह किले का निर्माण हुमायूँ ने 1535 में किया था। जिसको शेरशाह सूरी ने 1540 में तहस नहस करके पुराने किले को बनवाया। हुमायूँ की मृत्यु के बाद हुमायूँ के बेटे अकबर ने सिंहासन संभाला। और आगे चल कर हुमायूँ के मकबरे का निर्माण कराया। जिसका जिक्र
आइन-ए-अकबरी नमक पुस्तक में मिलती है।
हुमायूँ के मकबरे से जुड़े रोचक तथ्य
* मकबरे के पहले तल पर 64 कमरे है और 4 दूसरे तल पर है, और सभी कमरों में किसी न किसी का कब्र दफ़न है। बाकि बाकि के कब्र मकबरे के सामने के बगीचों में स्थित है।
* शुरू में हुमायूँ के मकबरे के पीछे यमुना नदी बहा करती थी। जिसका पानी पुरे मकबरे को ठंडा रखती थी। आज के दिनों में यमुना नदी मकबरे से 5 किलोमीटर दूर बहने लगी है।
* मकबरे में बनी नहर, कुरान के आयतों में लिखी हुई जन्नत की नहर से मेल खाती है। या यूँ कहें, जन्नत के नहर को इस मकबरे में उतारा गया है।
* अंग्रेज़ों द्वारा इस मकबरे को कब्ज़े में लेने के बाद इस मकबरे में काफी बदलाव किये गए। जिसमे मुग़ल शैली वाले चार बाग़ अंग्रेजी शैली में, और केंद्रीय सरोवर को गोल चक्करों में बदल दिए गए। साथ ही क्यारियों में पेड़ लगा दिए।
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