भोपालः भारत का दिल कहा जाने वाला मध्य प्रदेश जितनी अपनी सुंदरता और ऐतिहासिक चीजों के लिए विश्व प्रसिद्ध है उतना ही ये अपने रहस्यमयी स्थानों के लिए भी जाना जाता है। पौराणिक काल से जुड़ा यहां का इतिहास न जाने कितनी अनसुलझी पहेलियों को खुद में समेटे हुए है। पुरातत्व विभाग के अंतर्गत प्रदेश में आज भी ऐसी कई जगह हैं जो अपने आप में एक पहेली के समान है, जिनका क्या अर्थ ये जानने वाला खुद ही उलझता जाता है। ऐसी ही एक अनसुलझी पहली मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में स्थित असीरगढ़ के किले की भी है, जिससे जुड़े कई रोचक किससे आपको हैरान कर देंगे।
खुदाई में सामने आई हजारों साल पुरानी ये चीजें
किले से जुड़ा रहस्यमयी तथ्यअसीरगढ़ किला भारत खास संरचनाओं में से एक है, जो सतपुड़ा की पहाड़ियों पर स्थित है। समुद्र तल से लगभग 250 फुट की ऊंचाई पर स्थित ये किला आज भी अपने वैभवशाली अतीत को बयान करता है। ऐसा कहा जाता है कि, ऊंचे पहाड़ पर स्थित इस किले में एक जलाशय है, जो कितनी ही भीषण गर्मी हो कभी सूखा नहीं है। यहां के लोग ये मानते हैं कि, भगवान कृष्ण के श्राप का शिकार अश्वत्थामा यहां स्नान करने के बाद पास में स्थित शिव मंदिर में पूजा करने जाते हैं। भगवान शिव का मंदिर तालाब से थोड़ी दूर गुप्तेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है। मंदिर के चारों ओर गहरी खाईंयां हैं। माना जाता है कि इन खाइयों में से किसी एक में गुप्त रास्ता है, जो मंदिर से जुड़ा है।

भगवान कृष्ण के श्राप के कारण अश्वत्थामा आज भी दर-दर भटक रहा है, जो शिव की आराधना करता है
महाभारतकाल से जुड़ी हैं यहां की
भगवान कृष्ण के श्राप के कारण अश्वत्थामा आज भी दर-दर भटक रहा है, जो शिव की आराधना करता है
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| हर सुबह शिव लिंग पर चढ़े मिलते हैं फूल |
कौन हैं अश्वत्थामा?
हर सुबह शिव लिंग पर चढ़े मिलते हैं फूलअश्वत्थामा महाभारतकाल यानी द्वापर युग में जन्मे थे। उन्हें उस युग का श्रेष्ठ योद्धा माना जाता था। वे गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र व कुरु वंश के राजगुरु कृपाचार्य के भानजे थे। द्रोणाचार्य ने ही कौरवों और पांडवों को शस्त्र विद्या सिखाई थी। महाभारत के युद्ध के समय गुरु द्रोण ने हस्तिनापुर राज्य के प्रति निष्ठा होने के कारण कौरवों का साथ देना उचित समझा। अश्वत्थामा भी अपने पिता की भांति शास्त्र व शस्त्र विद्या में निपुण थे। पिता-पुत्र की जोड़ी ने महाभारत के युद्ध के दौरान पांडवों की सेना को छिन्न-भिन्न कर दिया था।
असीरगढ़ का नामकरण ?
किले को लेकर देश-प्रदेश के विद्वानों का मानना है कि, इसका निर्माण रामायण काल में हुआ है। असीरगढ़ के नामकरण के पीछे एक इतिहास से संबंधित एक कथा जुड़ी है। कथा के अनुसार यहां कभी कोई आशा अहीर नाम का इंसान रहने आया था, जिसके पास हजारों पशु थे। कहा जाता है कि उन पशुओं की सुरक्षा के लिए आशा अहीर ने ईंट गारा - मिट्टी व चूना-पत्थरों का इस्तेमाल कर दीवारें बनाई थी। इसी वजह से कथा को महत्व देते हुए अहीर के नाम पर इस किले को असीरगढ़ नाम दिया गया। इस किले पर कई सम्राटों का शासन रहा है। यहां कई समय तक चौहान वंश के राजाओं ने भी राज किया है।





