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| ( नरवर किला ) Narwar Fort |
खूबसूरत वादियों और संस्कृति से ओत–प्रोत है, मध्यप्रदेश का नरवर किला।शिवपुरी जिले से 302 किमी. दूर और ग्वालियर से तकरीबन 82 किमी. दूर, यह किला काली सिंध नदी के पूर्व में 500 फीट की ऊंची पहाड़ी पर बसा हुआ है। पूरा किला 7 किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है। कहा जाता है कि आज से लगभग 200 साल पहले पूर्व दिल्ली–पूना राजमार्ग का प्रमुख नगर नरवर ही था।
राजा
नरवर का किला बुंदेलखंड में पहले एवं मध्य भारत के ग्वालियर किले के बाद दूसरे नंबर का है। नरवर दुर्ग नाग राजाओं की राजधानी था। यहां ९ नाग राजाओं ने राज किया। ये राजा इस प्रकार से थे:
- भीम नाग (57–82ई.)
- खुर्जर नाग (82–107ई.)
- वत्स नाग (107–132ई)
- स्कंधनाग (132–187)
- बृहस्पति नाग (187–202ई.)
- गणपति नाग (202–226ई.)
- व्याग्र नाग (226–252ई.)
- वसुनाग (252–277)
- देवनाग (277–300ई.)
इनके बाद समुद्र गुप्त ने नाग राजाओं पर आक्रमण किया एवं इस वंश को समाप्त कर किले को अधीन किया। इस बारे में इलाहाबाद स्तंभ में उल्लेख मिलते हैं।
किले से जुड़ी है ऐतिहासिक प्रेम कहानी
नरवर किला को नल और दमयंती की प्रेम कहानी की वजह से भी जाना जाता है। दमयंती विदर्भ देश के राजा भीम की पुत्री थी। वहीं, नल निषध के राजा वीरसेन के पुत्र थे। कहा जाता है कि दोनों ही बहुत रूपवान थें। उनकी सुंदरता की चर्चा दूर–दूर तक थी। दोनों एक दूसरे की सुंदरता के बारे में सुनकर ही, एक–दूसरे को बिना देखे ही प्रेम करने लगे थे।
जब दमयंती के स्वयंवर का आयोजन हुआ तो उसमें इन्द्र, वरुण, अग्नि तथा यम भी आए। चारों स्वयंवर में नल का चेहरा धारण करके आए थे। नल की तरह दिखने वाले पाँच पुरुषों को देखकर दमयंती डर गयी। कहा जाता है कि दमयंती के प्यार में इतनी ताकत थी कि उसने देवताओं से शक्ति मांगकर अपने असली प्रेम को पहचाना और उससे शादी कर ली।
दोनों कुछ समय तक ही साथ रह पातें हैं और फिर एक–दूसरे से अलग हो जातें हैं। नल अपने भाई पुष्कर से जुएं में सब कुछ हार जाता है। जिसके बाद दमयंती किसी राजघराने में रहती है और फिर अपने परिवार के साथ रहने लगती है। लेकिन अपना सब कुछ हार जाने के बाद नल गायब हो जाता है। नल को ढूंढने की बात करके दमयंती के पिता उसके स्वयंवर की घोषणा कर देते हैं।
दमयंती से अलग होने के बाद नल को कर्कोटक नाम के सांप ने काट लिया होता है। जिसकी वजह से उसका रंग काला पड़ गया और उसे कोई पहचान नहीं सकता था। वह बाहुक नाम से सारथी बनकर विदर्भ पहुंचा। दमयंती के लिए नल को पहचान पाना मुश्किल नहीं था। उसने अपने प्रेम को पहचान लिया। नल ने अपने भाई पुष्कर के साथ फिर से जुआ खेला और हारी हुई सारी चीजें जीत ली। कहा जाता है कि दमयंती का प्रेम इतना सच्चा था कि नल के रंग से भी उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ा।
किले के नाम और उससे जुड़ा इतिहास
किले से जुड़ी मनमोहक बातें
कई सीढ़ियों को चढ़ने के बाद किले तक पहुंचा जाता है। लेकिन सीढ़ियों पर चढ़ने की थकान किले तक पहुंचने के बाद तब खत्म हो जाती है। जब नज़रे वहां की खूबसूरती को अपने अंदर भरने लगती हैं। नरवर किले का पूरा क्षेत्र चार स्थानों में बंटा हुआ है। वह चार स्थान हैं– मचलोक, मदार, गजूर और ढोल अहातों। किले के चारों तरफ मन को मोह लेने वाली हरियाली वादियां हैं। चारों तरफ़ से किला पहाड़ों से घिरा हुआ है। जिसे जितना देखो, उतना ही कम लगता है। नज़रे उन नज़ारों को बार–बार देखना चाहती हैं।
🔹जैसे यह कुछ स्थान हैं, जहां आप घूमना पसंद करेंगे। तालकटोरा, चंदन खेत महल और कचहरी महल।
🔹किले के अंदर एक अखाड़ा भी है जहां कुश्ती और मल युद्ध का आयोजन होता था।
🔹किले में एक ही जगह 8 कुएं और 16 बावरियां हैं। ऐसा कहा जाता कि यहां से 16 सौ पनिहारिन ( पानी भरने वालीं) एक साथ पानी भरती थीं।
🔹ऐसा कहा जाता है कि किले के अंदर एक पूरा नगर बसा करता था। जिसमें मीणा बाज़ार सबसे मुख्य था। जहां से लोग ज़रूरत की चीजें खरीदते थें।
श्रेष्ठ नर राजा नल के नाम पर बसा है नरवर
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| King of Narwar Fort |
यहां बता दें कि नरवर का नाम राजा वीरसेन के पुत्र नल के नाम पर पड़ा था। महाभारत के वनपर्व में जब धर्मराज को अपना वैभव छोड़ कर वन-वन भटकना पड़ा था, तक ऋषि वृहदश्व ने राजा नल की कहानी सुनाई थी। इतिहासकार अरुण अपेक्षित का कहना है कि महाभारत काल में जब पांडव अपना सब कुछ जुएं में हारकर वन-वन भटक रहे थे, तब युधिष्ठिर ने ऋषि वृहदश्व से पूछा कि हमने ऐसा क्या किया कि हमें यह सब भोगना पड़ा। इसके बाद ऋषि ने युधिष्ठिर को बताया कि नरवर के राजा नल को भी उनके छोटे भाई ने छल से जुए में हराकर सब-कुछ छीन लिया। राजा नल इतने प्रतापी थे कि वे अपनी प|ी को लेकर जंगल की ओर जा रहे थे, तब उनके सम्मान में महल के सारे कंगूरे झुक गए थे। पसर देवी आकर किले के दरवाजे पर लेट गईं थीं। उनका मंदिर आज भी यहां बना हुआ है। इसका वृतांत महाभारत के वनपर्व में भी आता है। इसलिए राजा नल को श्रेष्ठ कहा गया है।
खजाने की रक्षा करने के लिए लेट गई थीं कुलदेवी
नरवर किले के दरवाजे के पास पसरदेवी का मंदिर है। यहां माता की विशाल मूर्ति लेटी हुई अवस्था में है।महाभारत काल में जब राजा नल जुए में छोटे भाई से अपना सारा राजपाट हार गए थे और वे पत्नी को साथ लेकर जाने लगे, तब उनकी कुलदेवी खजाने की रक्षा के लिए किले के दरवाजे के समीप आकर लेट गई थीं। तभी से उनका नाम पसरदेवी पड़ा। शिवपुरी जिले के नरवर इलाके में यह किंवदंती काफी प्रसिद्ध है। किले के मुख्यद्वार पर 12 फीट लंबी और आठ फीट चौड़ी पसरदेवी की मूर्ति की दोनों भुजाओं के नीचे 7-8 फीट गहरा गड्ढा नजर आता है। इसमें सिक्का डालने पर 'खन्न्' की आवाज आज भी आती है, इसलिए इसे धन और खजाने से जोड़ा जाता है। यही इस जगह की सबसे बड़ी विशेषता है। इतिहासकार डॉ. मनोज माहेश्वरी के मुताबिक किले में खजाने से जुड़ी बातें सामने तो आती रही हैं, लेकिन इतिहास से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध बात यह है कि नरवर को तंत्र-मंत्र और जादू की नगरी कहा जाता रहा है। किले पर तांत्रिक पीठ होने के प्रमाण भी मिलते रहे हैं।
पसरदेवी को कछवाहों की देवी कहा जाता है। पूर्व केंद्रीय मंत्री माधवराव सिंधिया तो खास अवसर पर यहां नियमित पूजा के लिए आते थे। यही कारण है कि सालभर इस किले और मंदिर में पर्यटकों का आना लगा रहता है। नरवर को ऐतिहासिक नगर का दर्जा दिलवाने के प्रयास भी जारी हैं। 500 फीट ऊंचा नरवर का किला करीब आठ वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है। किले के दरवाजे के पास पसरदेवी का मंदिर है। यहां माता की विशाल मूर्ति लेटी हुई अवस्था में है।
पसरदेवी को कछवाहों की देवी कहा जाता है। पूर्व केंद्रीय मंत्री माधवराव सिंधिया तो खास अवसर पर यहां नियमित पूजा के लिए आते थे। यही कारण है कि सालभर इस किले और मंदिर में पर्यटकों का आना लगा रहता है। नरवर को ऐतिहासिक नगर का दर्जा दिलवाने के प्रयास भी जारी हैं। 500 फीट ऊंचा नरवर का किला करीब आठ वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है। किले के दरवाजे के पास पसरदेवी का मंदिर है। यहां माता की विशाल मूर्ति लेटी हुई अवस्था में है।
इस ढोली को गाने के लिए बनवाए गए दौहे
जब ढोली नरवर के लिए रवाना हो रहा था तब राजकुमारी ने उसे अपने पास बुलाकर मारू राग में दोहे बनाकर दिए और समझाया कि कैसे उसके प्रियतम के सम्मुख जाकर गाकर सुनाना है। यह सब इसलिए किया गया क्योंकि दूसरी राजकुमारी किसी भी संदेस वाहक को राजा तक पहुंचने से पहले मरवा देती थी।ढोली, गायक ने राजकुमारी को वचन दिया कि वह या तो राजकुमार को लेकर आएगा या फिर वहीं मर जाएगा। चतुर ढोली याचक बनकर किसी तरह नरवर में राजकुमार के महल तक पहुंचा।
और उसने रात में उसने ऊंची आवाज में गाना शुरू किया। उसके मल्हार वादन से बारिश होने लगी। मल्हार राग का मधुर संगीत राजकुमार के कानों में गूंजने लगा। वह झूमने लगा तब ढोली ने साफ शब्दों में राजकुमारी का संदेश गाया।
गीत में राजकुमारी का नाम सुनते ही साल्हकुमार चौंका और उसे अपनी पहली शादी याद आ गई। ढोली ने गा-गाकर बताया कि उसकी प्रियतमा कितनी खूबसूरत है। और उसकी याद में कितने वियोग में है।
ढोली ने दोहों में राजकुमारी की खूबसूरती की व्याख्या कुछ ऐसे की। उसके चेहरे की चमक सूर्य के प्रकाश की तरह है, झीणे कपड़ों में से शरीर ऐसे चमकता है मानो स्वर्ण झांक रहा हो। हाथी जैसी चाल, हीरों जैसे दांत, मूंग सरीखे होंठ है। बहुत से गुणों वाली, क्षमाशील, नम्र व कोमल है, गंगा के पानी जैसी गोरी है, उसका मन और तन श्रेष्ठ है। लेकिन उसका साजन तो जैसे उसे भूल ही गया है और लेने नहीं आता।
ढोली पूरी रात ऐसे ही गाता रहा, सुबह राजकुमार ने उसे बुलाकर पूछा तो उसने पूंगल से लाया राजकुमारी का पूरा संदेशा सुनाया। आखिर साल्हकुमार ने अपनी पहली पत्नी को लाने हेतु पूंगल जाने का निश्चय किया पर उसकी दूसरी पत्नी मालवणी ने उसे रोक दिया।
आखिरकार एक दिन राजकुमार अपनी प्रियतमा को लेने पूंगल पहुंच गया। वियोग में जल रही राजकुमारी अपने प्रियतम से मिलकर खुशी से झूम उठी। आखिर उसे उसका प्रेम जो मिल गया था। दोनों ने पूंगल में कई दिन बिताए। दोनों एक दूसरे में खो गए।





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